May 29, 2026
वाटर एटीएम ने संभाल लिया शहर, अन्यथा सूखे कंठ भी तर करना हो जाता मुश्किल

वाटर एटीएम ने संभाल लिया शहर, अन्यथा सूखे कंठ भी तर करना हो जाता मुश्किल

अफसोस: किसी भी जनप्रतिनिध ने अभी तक नहीं उठाई जनता की आवाज, विपक्षी कांग्रेस भी निंद्रा में

शिवपुरी। ड्राई जोन हो चुके शिवपुरी शहर में गर्मियों के मौसम में एक हजार फीट गहराई में भी पानी नहीं मिलता। शहर के अधिकांश ट्यूबबेल दम तोड़ गए, तथा पूरा शहर सिंध जलावर्धन योजना पर आश्रित हो गया। नौतपा में जब पारा 44 डिग्री पर पहुंचा, तो सिंध की सप्लाई ठप हो गई। पानी के लिए परेशान जनता के कंठ तर करने के लिए वाटर एटीएम फिलहाल वरदान बने हुए है, जो नगद रुपए लेकर पानी तो उपलब्ध करा रहे हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि शहर गम्भीर जलसंकट से गुजर रहा है, लेकिन कोई भी जनप्रतिनिधि इस समस्या को दूर करने की दिशा में कोई पहल नहीं कर रहा।
गौरतलब है कि शिवपुरी में प्रोजेक्ट लाने का क्रेडिट लेने में हमारे नेता सबसे आगे रहते हैं, लेकिन उसकी मॉनिटरिंग करने की जिम्मेदारी उनके चरण सेवक तक नहीं उठाते। यही वजह है कि जो सिंध जलावर्धन योजना 2 साल में पूरी होनी थी, वो 15 साल बाद भी अधूरी है। इस दौरान शहर में बनाई गईं नई कालोनियों में तो पाइप लाइन डाल दी गई, लेकिन शहर का मुख्य बाजार छोड़ दिया गया। जिसके चलते अब बाजार की गलियों से लेकर मुख्य सड़कों को खोद दिया गया। पाइप लाइन डालने के लिए खोदी गईं सड़कों की वजह से दुकानदार से लेकर शहरवासी गिरकर चोटिल हो रहे हैं। अब बरसात का मौसम आने वाला है, जिसमें शहर के बाजार में यह खुदी सड़कें और भी अधिक खतरनाक हो जाएंगी।
बीते एक सप्ताह से बंद हुई सिंध की सप्लाई के संबंध में नगरपालिका के जिम्मेदारों से किसी भी जनप्रतिनिधि ने यह नहीं पूछा कि सप्लाई कब तक शुरू हो पाएगी, या समस्या क्या आ गई है। आज भाजपा के प्रवक्ता धैर्यवर्धन शर्मा का वीडियो जरूर वायरल हुआ है, जिसमें वो नपा के पेयजल प्रभारी सचिन चौहान को फोन लगाकर शहर में गहराए गम्भीर जल संकट से अवगत करा रहे हैं। नपाध्यक्ष का कहना है कि जब पाइप लाइन बदली जा रही थी, तभी हमने नई मोटर लाने के लिए टेंडर आमंत्रित किया था, लेकिन उसे भी जान बूझकर लंबित किया गया। नगरपालिका में चल रहे विवाद का दंश शहर की जनता को भुगतना पड़ रहा है।

ऐसे चली 15 वर्षीय सिंध जलावर्धन योजना:

लगभग 15 वर्ष पूर्व जब यह योजना शुरू हुई थी, तब इसकी लागत 54 करोड़ रुपए थी, जो अब बढ़कर लगभग 200 करोड़ पर पहुँच गई। मेन लाइन में प्लास्टिक के पाइप डालने के बाद प्रोजेक्ट का काम नेशनल पार्क प्रबंधन ने रुकवा दिया था। लगभग 3 साल बाद जब पुनः काम शुरू हुआ और पानी की सप्लाई हुई तो पाइपों के फटने का सिलसिला चल निकला था। पाइप लीकेज सुधारने के नाम पर ही नगरपालिका ने इतना भुगतान कर दिया कि उतने खर्चे में 4 नई मोटर आ जातीं। चूंकि हर भुगतान ओर मोटा कमीशन था, इसलिए भुगतान पर कोई रोक नहीं लगी। अब जब मेन पाइप लाइन बदल गई, तो मोटर साथ छोड़ गईं, जिसके चलते शहर की जनता पानी के लिए तरस रही है। अब यदि मोटर भी नई आ जाएंगी, तो डिस्ट्रीब्यूशन लाइन फटने लगेंगी। यानि यह प्रोजेक्ट निरंतर रिपेयर होता रहेगा, तथा जनता पानी के लिए यूं ही परेशान होती रहेगी।

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