
सड़बूढ़ में जहां तोड़ा जा रहा था अवैध निर्माण, 100 कदम की दूरी पर चल रहा रेत का परिवहन
शिवपुरी। जिस तरह के प्रशासनिक प्रेस नोट जारी किए जाते हैं, उनमें से यदि 25 प्रतिशत भी प्रशासन सख्ती से कार्यवाही कर दे, तो लगातार हो रहे प्रकृति के नुकसान को काफी हद तक बचाया जा सकता है। अब शुक्रवार की ही बात है, जब प्रशासन का अमला धमकी देने वाले का अवैध अतिक्रमण तोड़ रहा था, तो वहां से महज 100 कदम की दूरी पर ही रेत का अवैध उत्खनन एवं परिवहन बेरोकटोक चल रहा था। राजनीतिक संरक्षण में चल रहा प्रकृति का दोहन आने वाले समय में वेनेजुएला जैसे भूकंप का कारण बनेगा।
जिले में पत्थर और रेत का अवैध उत्खनन एवं परिवहन का काम बरसों से चल रहा है। सिंध नदी के किनारों को खनन माफिया ने इस कदर खोद दिया है कि कई जगह नदी की दिशा ही बदल दी।
शिवपुरी जिले की करेरा एवं कोलारस विधानसभा रेत के अवैध उत्खनन एवं परिवहन के लिए कुख्यात है। इन दोनों विधानसभा में स्थानीय नेताओं के संरक्षण में यह कारोबार दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है। कोलारस विधानसभा में सिंध नदी के 8 घाटों पर अवैध रूप से रेत का उत्खनन एवं परिवहन किया जाता है। जिस घाट पर स्थानीय नेताओं के विरोधी रेत ढोने लगते हैं, वहां पर प्रशासन की मदद से कार्यवाही करवा दी जाती है, जैसा पिछले दिनों रिजौदी घाट पर हुआ था। उधर करेरा में तो एक पूर्व विधायक का नाम ही रेतीला विधायक रख दिया गया था। हालांकि वो अभी भी सत्ता में उच्च पद पर विराजमान हैं।
शिवपुरी व पिछोर में पत्थर का अवैध उत्खनन::
जिले की शिवपुरी विधानसभा के बम्हारी में तथा सुरवाया के पास फॉरेस्ट एरिया में बड़े पैमाने पर पत्थर का अवैध उत्खनन किया जा रहा है। उधर पिछोर के शेरगढ़ व उसके आसपास हजारों बीघा फॉरेस्ट एरिया में पत्थर का बड़े पैमाने पर अवैध उत्खनन करके प्रकृति को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया जा रहा है। इन क्षेत्रों में भी स्थानीय नेताओं के संरक्षण में यह कारोबार बहुत तेजी से फलफूल रहा है। पत्थर खदान से प्रकृति को अधिक नुकसान इसलिए होता है, क्योंकि पत्थर निकालने के लिए पेड़ों को काटा जाता है, तथा गड्ढे की सफाई में निकलने वाले मटेरियल को भी हरे-भरे पेड़ों पर डालने से वहां पत्थर के टुकड़ों का ढेर लग जाने से उक्त स्थान पर फिर कभी हरियाली नहीं हो पाती।
अब तो अड़ने वाले अधिकारी हैं:
बीते दिनों पिछोर में पत्थर से भरी ट्रेक्टर ट्रॉली पकड़ने एवं शासकीय कार्य में बाधा डालने वाली एफआईआर भले ही 6 दिन बाद हुई हो, लेकिन वीडियो में जो दिख रहा है, उससे तो लगता है कि माइनिंग में अब अड़ने वाले अधिकारी आ गए हैं। तो फिर क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि प्रेस नोट में प्रशासन जो दावा करता है, उसे पूरा भी करेगा..?







