
विश्व मना रहा पर्यावरण दिवस, हम काट रहे हरे-भरे पेड़, शायद इसलिए धधकने लगी सिंधिया राजवंश की ग्रीष्मकालीन राजधानी
जिले में प्रोजेक्टों के नाम पर काटे गए पेड़ों के बदले नहीं हुए प्लांटेशन, फॉरेस्ट की जमीन पर जंगल काट कर कब्जा कर रहे नेता
शिवपुरी। हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। जब पूरा विश्व उसे मनाता है, तो फिर हमारे जिले में भी कार्यक्रम करके पेड़ों का महत्व बताया जाता है, लेकिन इसे महज औपचारिकता ही कहा जाएगा, क्योंकि जिस शिवपुरी को सिंधिया राजवंश ने गर्मियों के मौसम में ठंडक होने की वजह से ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया था, वहां अब गर्मी असहनीय हो गई। जिले में प्रोजेक्टों के नाम पर जो थोकबंद हजारों पेड़ काटे गए, उनकी जगह तीन गुना पेड़ लगाने के लिए संबंधित कंपनी ने विभागों को राशि दी, लेकिन अधिकारी व नेताओं ने मिलकर राशि का बंदरबांट कर लिया, तथा जनता को आग जैसी गर्मी में झुलसने को छोड़ दिया। फॉरेस्ट की जमीन पर सत्ताधारी नेता जंगल काटकर उस पर कब्जा कर रहे हैं, तथा दबंग जंगल में खेती कर रहे हैं। यही वजह है कि सिंधिया राजवंश की ग्रीष्मकालीन राजधानी में अब गर्मी असहनीय होती जा रही है।
एक पौधे को पेड़ बनाने में बरसों लग जाते हैं, लेकिन जंगल माफिया चंद मिनट में उसका अस्तित्व खत्म कर देता है। शिवपुरी के डीएफओ ने स्वीकार किया था कि जिले में लगभग 6 हजार हेक्टेयर फॉरेस्ट में कब्जा कर खेती हो रही है। अभी कुछ समय पूर्व सतनबाड़ा रेंज के नयागांव के पास लगभग 300 बीघा फॉरेस्ट की जमीन पर कोलारस के सत्ताधारी नेताओं ने फेंसिंग करके कब्जा कर लिया। हाइवे किनारे करोड़ों की इस जमीन पर कब्जा हटवाने का प्रयास पूर्व रेंजर ने किया, तो नेताओं सहित जंगल माफिया ने मिलकर उसका ट्रांसफर करवा दिया। चूंकि फॉरेस्ट के एक वरिष्ठ अधिकारी सत्ताधारी नेता के बिरादरी भाई भी हैं, इसलिए वो भी कोई एक्शन नहीं ले रहे। इसी तरह नरवर के धमकन गांव के पास जंगल माफिया ने सिंध नदी में रास्ता बनाकर पहाड़ी पर जंगल से काटी गई लकड़ी व अवैध उत्खनन का पत्थर निकाल रहे हैं। यहां पहाड़ी पर पेड़ों के ठूंठ ही बचे हैं।
जब जंगल को बचाने की तनख्वाह लेने वाले ही जंगल कटवा कर सत्ताधारी नेताओं के कब्जे करवा रहे हों, तो फिर वहां पर विश्व पर्यावरण दिवस जैसे कार्यक्रम सिर्फ़ औपचारिक ही बनकर रह जाते हैं। यदि आप शिवपुरी जिले की पहाड़ियों को गौर से देखेंगे तो वहां अब काफी दूर दूर थोड़े बहुत ही पेड़ नजर आते हैं।
ऊपर और भी बड़ा खेल::
यदि बात देश की करें तो वहां पर्यावरण की चिंता किसी को नहीं है। मैने एक माह सिंगरौली में पत्रकारिता की थी, वहां पर अडानी ग्रुप को जब कोयले की पहाड़ी दी गई, तो वहां रहने वाले परिवारों को आधी रात में पुलिस ने लाठियां बरसा कर भगाया, तथा वहां लगे हजारों पेड़ों को काट दिया गया। वहीं देश के कई राज्यों के जलवायु को प्रभावित करने वाली अरावली की पर्वतश्रंखला पर लगे जंगल को भी अडानी ग्रुप को देने की तैयारी भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने कर ली थी। एनवक्त पर जंगल प्रेमियों ने सुप्रीम कोर्ट का सहारा लिया, तो उस पर रोक लगी। यह तो पूरा देश जानता है कि गौतम अदाणी किसके दोस्त हैं..!






