
सिद्धेश्वर मेले में आए झूले, पार्किंग की जगह रेत-गिट्टी डंप, मेले के रंगमंच पर भी हुआ कब्जा
सीएमओ की मनमानी के चलते लेट हुआ मेला, अभी तक हो जाना था शुरू, अभी लग रहे झूले
शिवपुरी। बरसों पुराना सिद्धेश्वर मेला इस बार आधा मई गुजरने के बाद भी शुरू नहीं हो पाया। मेले में झूले कसने लगे हैं, लेकिन जहां वाहन पार्किंग की जगह है, वहां पर रेत और गिट्टी के ढेर लगे हुए हैं। इतना ही नहीं, मेला रंगमंच के चबूतरे पर भी एक प्राइवेट कंपनी ने कब्जा कर लिया है। हालात देखकर तो ऐसा लगता है कि मेले की सिर्फ औपचारिकता निभाई जा रही है, तथा कोई भी जिम्मेदार इसके प्रति संजीदा नहीं है।
गौरतलब है कि शिवपुरी के प्राचीन सिद्धेश्वर मेले को खत्म करने के कुत्सित प्रयास करते हुए गांधी पार्क में मेला लगाने का मौखिक आदेश सीएमओ ने दिया था। पूर्व कलेक्टर ने जब हस्तक्षेप किया, तब टेंडर निकालकर मेला लगाने में नियम का पालन किया गया। चूंकि सिद्धेश्वर मेले के भूमिपूजन के बाद गांधी पार्क में मेला इस उद्देश्य से लगाया गया कि शिवपुरी का प्राचीन मेला खत्म हो जाए। गांधी पार्क में मेला जब लगाया गया, तो आंधी और बारिश ने कुछ दिन तो मेले को बदहाल कर दिया था। बाद में कुछ समय तक मेला संचालित हुआ। चूंकि गांधी पार्क में मेला गर्मियों के मौसम में उसी समय लगाया गया, जब सिद्धेश्वर मेला भरता है, इसलिए प्राचीन मेला लेट हो गया।
देर से ही सही, अब सिद्धेश्वर मेले में झूले लगना शुरू हो गए हैं। मेले की वाहन पार्किंग परिसर के बाहर बनाई जाती है, लेकिन उस जगह पर कई डंपर डस्ट वाली रेत एवं गिट्टी के ढेर लगे हुए हैं। मेले में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए जो रंगमंच बनाया गया था, उस पर एड लगाने वाली कंपनी का कब्जा होने के साथ ही उसका मटेरियल भी उस पर पड़ा हुआ है। ऐसे में मेले के सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए भी जगह नहीं बची है। यानि सिद्धेश्वर मेला लगाने में कोई भी स्थानीय जनप्रतिनिधि दिलचस्पी नहीं ले रहा, तथा सीएमओ की मनमानी के चलते यह मेला महज औपचारिक बनकर रह जाएगा।
बरसों से बक्से वाले का भी कब्जा:
सिद्धेश्वर के पास जिस जगह पर आतिशबाजी का बाजार दीपावली के दौरान लगता है, वहां पर एक बक्से व ड्रम बनाने वाले ने बरसों से कब्जा कर रखा है। उसका सामान आसपास बिखरा पड़ा रहता है। पूर्व में जब यह मामला उठा था तो कुछ लोगों ने यह कहकर मामले को दबा दिया था कि वो वफ्फ बोर्ड की जमीन पर बैठा है। जबकि उसी जगह पर आतिशबाजी की दुकानों का महंगा किराया नगरपालिका हर साल वसूलती है। यदि जमीन वफ्फ बोर्ड की है, तो फिर आतिशबाजी की दुकान वालों से नपा को वसूली नहीं करनी चाहिए। यह शिवपुरी है, जहां कुछ भी चल रहा है, और जिम्मेदार मौन हैं।







