
शासन की जल संरक्षण योजनाएं, जिले में धरातल पर शून्य, मार्च में ही खाली होने लगा करई का तालाब
औसत से दोगुनी हुई बारिश के पानी को सहेजने के लिए नहीं है संरचनाएं, पुराने तालाबों के नाम पर सिर्फ कागजों में गहरीकरण
शिवपुरी। बारिश का पानी सहेजने के लिए हर वर्ष प्रदेश सरकार जल संरक्षण की योजना बहुत बनाकर सभी जिलों को निर्देश जारी किए जाते हैं। इसका शिवपुरी जिले में धरातल पर कितना अस्त हुआ है, वो सुरवाया के ग्राम करई के तालाब को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है। इस तालाब के बीच और किनारों पर मिट्टी के ढेर नजर आने लगे। मार्च के आखिरी सप्ताह में ही तालाब इतना सूख चुका है, जबकि अप्रैल, मई और जून की गर्मी अभी शेष है।
शिवपुरी जिला मुख्यालय हो नहीं शिवपुरी के अंचल में भी भूजल तेजी से नीचे गिर रहा है। जबकि इसके विपरीत बारिश भी औसत से दोगुनी हो रही है, तथा जल संरक्षण के नाम पर हर साल एक बड़ा बजट तालाबों पर खर्च कागजों में दिखाया जा रहा है। गुरुवार को जब SD News की टीम वहां पहुंची तो तालाब के किनारों पर बड़ी संख्या में गाय-भैंस पानी पी रहे थे, तो कई भैंस पानी में ठंडक ले रहीं थी। तालाब के यह हालात तब हैं जबकि मार्च में झमाझम बारिश हुई। वर्तमान में गर्मी तेज हो गई है, जिसके चलते तालाब के किनारे तेजी से सूखने लगे हैं। यदि जल संरक्षण का धरातल पर काम हुआ होता, तो तालाब की गहराई बढ़ाकर उसकी पार बनवा दी जाती, जिससे बारिश का पानी अधिक समय तक संरक्षित रह पाता, और गांव के मवेशियों को गर्मियों के भी पीने का पानी मिल पाता।
जल संरक्षण पर अरबों खर्च, नतीजा सिफर
शिवपुरी जिले में वाटर लेबल को बढ़ाने के लिए वाटरशेड के तहत तालाब, मेड बंधान , स्टॉप डैम आदि बनाने में पिछले 20 वर्षों के लगभग 4 अरब रुपए की राशि खर्च की गई। बावजूद इसके जिले का वाटर लेबल नहीं बढ़ा। बैराड़ में पचीपुरा तालाब बनने से वाटर लेबल में सुधार हुआ है। वहीं हर साल जल संरक्षण के नाम पर बड़ा बजट तालाबों के गहरीकरण एवं साफ सफाई पर खर्च करने के लिए आता है। तालाबों को कितना सहेजा गया है, यह करई के तालाब को देखकर समझा जा सकता है।
इंसानों के साथ मवेशी भी होते हैं परेशान
जब गर्मी अपना रौद्र रूप दिखाती है, तब ट्यूबबेल, हेडपंप साथ छोड़ जाते हैं, जिसके चलते इंसानों को भी कई किमी दूर से पानी लाना पड़ता है। वहीं गांव के मवेशी भी पानी की तलाश में यहां-वहां भटकते रहते हैं। पोहरी में तो पालतू मवेशियों को पानी न पिला पाने की वजह से ग्रामीण उन्हें भगवान भरोसे जंगल में छोड़ देते हैं।






