
शहर के बीचोबीच तालाब में हो रही खेती, जिम्मेदार सिर्फ बैठकों में दे रहे आदेश-निर्देश
केंद्रीय मंत्री की पिछले माह हुई बैठक में तय हुआ था कि जाधव सागर से कर्बला होते हुए चांदपाठा की साफ होगी जलकुंभी, नतीजा शून्य
शिवपुरी। शिवपुरी को आधुनिक पर्यटन नगरी बनाने के लिए जो प्लान तैयार किया गया, उसने तालाबों को संरक्षित करने का बिंदु भी शामिल है। शहर के बीचोबीच जाधव सागर तालाब के 80 फीसदी हिस्से में जलकुंभी की फसल लहलहा रही है। जबकि केंद्रीय मंत्री की पिछली बैठक में जलकुंभी की सफाई को जाधव सागर से कर्बला और फिर चान्दपाठा में करने के निर्देश दिए गए थे। यदि हालात ऐसे ही रहे तो लहलहा रही यह फसल तालाब को मार्च में ही सुखा देगी, क्योंकि गर्मी अभी से तेज हो गई।
शिवपुरी जिले की जल संरचनाओं पर ग्रहण की तरह छाई जलकुंभी भी अब केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की बैठकों में प्रमुख मुद्दे के रूप में शामिल रहती है। इसे साफ कराने के लिए डेढ़ साल पूर्व पौने 2 करोड़ रुपए की मशीन भी सांसद के सहयोग से शिवपुरी लाई गई। इस मशीन ने जितनी जलकुंभी नहीं निकाली, उससे कई गुना उसे चलाने के लिए उपयोग होने वाले फ्यूल पर खर्च हो चुकी है, तथा बिलों के भुगतान की प्रक्रिया जारी है। यानि मशीन ने तालाब पर छाई यह हरियाली तो उतनी ही हटाई, लेकिन जिम्मेदारों की जेब जरूर हरी कर दी है।
अब तो हर तालाब बना खेत
शिवपुरी शहर के जाधव सागर तालाब से जलकुंभी की शुरुआत हुई। उस दौरान कलेक्टर ने कहा था कि जलकुंभी से बनने वाले विभिन्न उत्पादों को बनाने वाली कंपनी को बुलाने की बात कही थी। वो कंपनी तो नहीं आईं, उल्टे जिले की सभी जल संरचनाओं पर कब्जा कर लिया। अब जाधव सागर, कर्बला, चांदपाठा और घसारही और माधव लेक को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया।
रंग-बिरंगे फूलों की डंडी बेचने वाले फैला गए
शिवपुरी शहर में लगभग 3 साल पूर्व बाहर से आए महिला/पुरुष हरी डांडियों में अलग-अलग रंग लगाकर उन्हें बेचने आए थे। उनका दावा था कि जिस डंडी में जो रंग लगा है, उसी रंग का आकर्षक फूल लगेगा। वो अपने साथ रंग बिरंगे फूलों का एलबम भी साथ लेकर आए थे। जितने बिक गए, उन्हें ठिकाने लगाकर बची हुई डंडियां जाधव सागर में फेंक कर चले गए थे। मैं भी ऐसी डंडी खरीदकर ले गया था, जिसे गमले में लगाया, जो बाद में जलकुंभी का पेड़ निकला।






