
इस बार मामला फिट लग रहा है, क्योंकि इत्तेफाक से पार्षदों के साथ विधायक ने भी बयां कर दिया दर्द
सस्पेंडेड सीएमओ की रवानगी तय, विधायक के दर्द को भी गंभीरता से सुना प्रदेश अध्यक्ष ने, नपाध्यक्ष की कुर्सी भी खतरे में
शिवपुरी। सप्ताह के पहले दिन यानि सोमवार को शिवपुरी शहर से तीन कार रवाना हुईं। दो कार में पार्षद सवार थे, जबकि तीसरी कार में भाजपा जिलाध्यक्ष जसमंत जाटव व शिवपुरी विधायक देवेंद्र जैन। कोलारस के पास जिलाध्यक्ष की गाड़ी ने पार्षदों की कारों को क्रॉस किया, तो कुछ पार्षद बोले कि जिलाध्यक्ष व विधायक जा रहे हैं। जिन्होंने नहीं देखा, उन्होंने इस बात को कन्फर्म करने के लिए जिलाध्यक्ष की यूपी नंबर वाली गाड़ी को ओवरटेक किया, तो स्पष्ट हो गया कि कार में दोनों ही हैं।
भोपाल पहुंचकर पार्षद जब भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से मिलने पहुंचे, उधर विधायक एवं जिलाध्यक्ष सीएम हाउस चले गए। इधर पार्षदों का मिलने का नम्बर जब आया, तो जिलाध्यक्ष व विधायक भी वहां पहुंच गए। चूंकि कथित तौर पर जिलाध्यक्ष सीएमओ की सुपारी लेकर आए थे, तो वे रुक गए, तथा पार्षदों के साथ विधायक भी प्रदेश अध्यक्ष के पास मिलने चले गए। पार्षदों ने जब पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा या नपाध्यक्ष व सीएमओ को हटाने की बात कही, विधायक भी चुप नहीं रहे।
बोले विधायक: वार्डों में घुस नहीं पाएंगे पार्षद
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार शिवपुरी विधायक ने प्रदेश अध्यक्ष से कहा कि भाजपा के यह पार्षद अपनी दम पर बमुश्किल चुनाव जीते, तथा उसके बाद विधानसभा और लोकसभा में इन पार्षदों ने अपने वार्डों में पार्टी को जीत दिलाई। वर्तमान में नगरपालिका में चल रही मनमानी की वजह से वार्डों में विकास कार्य नहीं हो पा रहे। यदि अभी भी बदलाव नहीं किए गए, तो चुनाव के दौरान यह पार्षद वोट मांगने वार्डों में यदि गए तो पीटे जाएंगे। भ्रष्टाचार के दस्तावेजी प्रमाणों को देखने के साथ पार्षदों के अलावा विधायक के दर्द को गम्भीरता से सुनकर भरोसा दिलाया कि बदलाव होगा।
आयातित जिलाध्यक्ष रह गए अकेले
पार्षदी सूत्रों का कहना है कि सीएमओ की सुपारी लेकर जिलाध्यक्ष गए थे। अब इसमें बड़ा सवाल यह भी है कि प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल पुराने मूल भाजपाई हैं, तथा वो यह भी जानते हैं कि जो दर्द सुनाने आए हैं, वो भी पार्टी के बरसों पुराने कार्यकर्ता हैं। जबकि जिलाध्यक्ष तो कांग्रेस से आयातित हैं, तथा संगठन एवं सिंधिया के बीच तनातनी में निगम/मंडल की नियुक्तियां अटकी हुई हैं। उसमें भी मूल भाजपाई एवं आयातित कांग्रेसियों का पेंच फंसा हुआ है।






