
घसारही में जलकुंभी ने सुखाया पानी, तालाब की जगह नजर आने लगा खेत, हाईकोर्ट में 24 फरवरी को होगी सुनवाई
रिटायर्ड कर्नल गिल ने जताई चिंता: रामसर आर्द्रभूमि संख्य सागर झील जलकुंभी की चपेट में, पारिस्थितिकी पर गहराता संकट
शिवपुरी। अंतरराष्ट्रीय महत्व की रामसर सूची में शामिल संख्य सागर झील (जो माधव राष्ट्रीय उद्यान का अभिन्न हिस्सा) आज गंभीर पर्यावरणीय संकट से जूझ रही है। झील का विशाल क्षेत्र आक्रामक जल खरपतवारों, विशेषकर जलकुंभी (वॉटर हायसिंथ) से पूरी तरह ढक चुका है, जिससे इस बहुमूल्य आर्द्रभूमि का पारिस्थितिक तंत्र लगभग नष्ट होने की कगार पर पहुँच गया है। यह मामला हाईकोर्ट में भी विचाराधीन होकर इसमें 24 फरवरी को तारीख लगी है। घासारही के पास तो यह तालाब किसी खेत की तरह नजर आने लगा, क्योंकि तालाब के पानी को जलकुंभी ने सोख लिया।
सेना के रिटायर्ड कर्नल बीएस गिल ने बताया कि कभी खुला, स्वच्छ जल और जैव विविधता से समृद्ध रही यह झील आज हरे कालीन जैसी दिखाई देती है। अनियंत्रित रूप से फैली जलकुंभी ने झील की सतह को ढक लिया है, जिससे सूर्य का प्रकाश पानी तक नहीं पहुँच पा रहा और जल में ऑक्सीजन का स्तर खतरनाक रूप से गिर गया है।
जलीय जीवन पर सीधा प्रहार
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, इस स्थिति ने झील में यूट्रोफिकेशन की प्रक्रिया को तेज कर दिया है, जिसके कारण मछलियों और अन्य जलीय जीवों का जीवन संकट में पड़ गया है। संख्य सागर झील कभी प्रवासी पक्षियों का प्रमुख शीतकालीन आश्रय स्थल थी, जहाँ दर्जनों प्रजातियाँ हर वर्ष आती थीं। किंतु हाल के वर्षों में पक्षियों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है, जो झील के बिगड़ते स्वास्थ्य का स्पष्ट संकेत है।
“यह केवल सौंदर्य का नुकसान नहीं है, बल्कि एक संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र का पतन है,” एक स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ता ने कहा। “यदि समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया गया तो यह रामसर स्थल केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा।”
प्रदूषण और उपेक्षा बनी मुख्य वजह
विशेषज्ञ मानते हैं कि झील में गंदे पानी का लगातार प्रवेश, जल प्रवाह का अभाव और दीर्घकालिक प्रबंधन की कमी इस संकट के प्रमुख कारण हैं। नाइट्रेट और फॉस्फेट जैसे तत्व जलकुंभी के अत्यधिक प्रसार को बढ़ावा देते हैं। साथ ही, माधव राष्ट्रीय उद्यान की अन्य झीलों — जैसे माधव सागर और जाधव सागर — में भी इसी प्रकार की समस्या देखी जा रही है, जिससे संख्य सागर में पुनः जलकुंभी फैलती रहती है।
पर्यटन व स्थानीय आजीविका पर असर
झील की दुर्दशा का सीधा असर पर्यटन गतिविधियों पर भी पड़ा है। नौकायन जैसी गतिविधियाँ लगभग बंद हो चुकी हैं, जिससे स्थानीय रोजगार प्रभावित हुआ है। पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों में प्रशासन की निष्क्रियता को लेकर गहरी नाराजगी है।
एनजीटी के निर्देश, पर ज़मीनी कार्रवाई धीमी
हाल ही में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने इस गंभीर स्थिति का संज्ञान लेते हुए संबंधित विभागों को झीलों की सफाई, जलकुंभी हटाने, आर्द्रभूमि सीमांकन और बिना उपचारित अपशिष्ट जल के प्रवाह को रोकने के निर्देश दिए हैं। इसके बावजूद, जमीनी स्तर पर ठोस और सतत कार्रवाई का अभाव स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है।
तत्काल समग्र पुनर्जीवन की आवश्यकता
पर्यावरणविदों का कहना है कि संख्य सागर झील को बचाने के लिए वैज्ञानिक ढंग से जलकुंभी हटाने, जल गुणवत्ता सुधारने, जैव-उपचार (बायोरिमेडिएशन) और दीर्घकालिक निगरानी की तत्काल आवश्यकता है। यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह रामसर आर्द्रभूमि आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल इतिहास बनकर रह जाएगी।






