
जिले की इस तिकड़ी पर लागू नहीं होते शासन के आदेश, यहीं पढ़े -बढ़े, बन गए जिला प्रमुख
हर साल लगता है रिन्युवल चार्ज, अपने ही स्टाफ व प्राइवेट काम करने वालों से चंदा करके देते हैं टिके रहने की फीस
शिवपुरी। जिले में कलेक्टर और एसपी तो हर 2-3 साल।में बदल जाते हैं, लेकिन जिले में कुछ ऐसे अधिकारी हैं, जिन पर ट्रांसफर नीति लागू नहीं होती। यहीं पले, बढ़े और पढ़े, फिर यहीं बन गए विभाग के प्रमुख, और उनकी सेटिंग देखकर लगता है कि वो रिटायरमेंट भी यहीं से लेंगे। उन्हें टिके रहने के लिए हर साल रिन्युवल कराना पड़ता है, जिसका चार्ज वो अपने ही विभाग और प्राइवेट दुकानों से इकठ्ठा करते हैं। अपने बचपन के मित्रों में जिले के प्रमुख विभाग में प्रतिनिधित्व करने में अलग फीलिंग आती होगी।
अधिकारी नंबर-एक
नाम: गोपाल जाटव
विभाग: फॉरेस्ट में रेंजर
मूलतः मगरौनी के रहने वाले गोपाल जाटव वन विभाग में रेंजर हैं। वो शिवपुरी मुख्यालय या उसके आसपास ही नौकरी करते रहे, और शायद रिटायरमेंट भी यहीं से होंगे। वन विभाग के अधिकारी पर प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने वाले जंगल की सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है। लोकल के ही होने की वजह से हर मिलने वाला जंगल का लाभ चाहता है। फिर वो फॉरेस्ट की जमीन पर कब्जा हो या हरियाली के दुश्मन।
अधिकारी नंबर-दो
नाम: डॉ. संजय ऋषिश्वर
विभाग: जिला मुख्य चिकित्सा अधिकारी
डॉ ऋषिश्वर मूलतः गोहद भिंड के रहने वाले हैं, लेकिन उनकी पढ़ाई के बाद नौकरी की शुरुआत शिवपुरी में ही हुई। बताते हैं कि पहले नवल चौहान और डॉ. साहब ही सीएमएचओ तय करते थे, लेकिन कलेक्टर शिवपुरी को जब डॉ. ऋषिश्वर का काम अच्छा लगा, तो फिर उन्हें पहले अस्थाई और फिर बाद में स्थाई का पत्र राजधानी से आया। सीएमएचओ बनने के बाद पूरे जिले की जिम्मेदारी आ गई है।
अधिकारी नम्बर- तीन
नाम: विवेक श्रीवास्तव
विभाग: जिला शिक्षा अधिकारी
विवेक श्रीवास्तव का बचपन और जवानी के साथ ही नौकरी की शुरुआत शिवपुरी से ही हुई। उनके बड़े भाई संजय श्रीवास्तव (पूर्व डीईओ) तो जिले के बाहर हो आए थे, लेकिन विवेक कभी बाहर नहीं गए, तथा एकाध बार ही जिला मुख्यालय छोड़ा। शिवपुरी उत्कृष्ट विद्यालय के प्राचार्य रहते हुए उन्हें जिला शिक्षा अधिकारी का प्रभार मिला। इस दौरान भोपाल से मनोज निगम की डीईओ के पद पर नियुक्ति हुई। आदेश आते ही निगम को उनके नजदीकियों ने माला पहनाकर मिठाई भी खिलाई, लेकिन विवेक जो कुर्सी से चिपके, तो फिर हटे नहीं।
स्वास्थ्य व शिक्षा में यह सब भी:
जिले के स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग में अधीनस्थों का ट्रांसफर, गलतियों पर नोटिक देकर समझौता शुल्क के रूप में ठीकठाक वसूली की चर्चा सरगर्म है। इसके अलावा बिना डिग्री के डॉक्टरों और बिना मान्यता के स्कूलों आदि से भी सुविधा शुल्क की बातें अक्सर सुनाई देती हैं।







